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सदगुरु कबीर की जयंती

 सदगुरु कबीर कभी नहीं डरे 

(कबीर जयंती पर विशेष प्रस्तुति)
 
- के सी पिप्पल
 
कबीर साहब के जन्म के बारे में अनेक मत हैं। एक मान्यता के अनुसार उनका जन्म किसी विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ और उसने लोक-लाजवश उस नवजात शिशु को काशी के लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया था। नीरू और नीमा नाम के जुलाहा दंपती ने उस बालक को अपने पुत्र की भांति पाला-पोसा और उसका नाम कबीर रखा। कबीर दास की जन्मतिथि के संबंध में भी मतभेद है, किंतु अधिकांश विचारकों ने उनका जन्म संवत् 1456 विक्रमी (1398 ईस्वी) पूर्णिमा के दिन माना है।
यही बालक बड़ा होकर बुद्ध के सत्य मार्ग पर चलने वाला कबीर बना जिसकी वाणी में इतनी प्रबल ऊर्जा थी कि उसके आगे सभी विरोधी मौन हो गए। कबीर के प्रवचनों से युगों से शूद्र और दलित घोषित लोगों में नई चेतना का संचार हुआ और वे सामाजिक अन्याय का बंधन तोड़कर स्वाभिमान से पूर्ण होकर खड़े हो गए। परंपरागत शास्त्रज्ञान और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध अपनी ओजस्वी वाणी का उद्घोष करने वाले संतप्रवर कबीर साहब को जन्म देकर भारत भूमि धन्य हुई थी।
 
कबीर साहब के बारे में जनश्रुति कहती है कि मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ। तब उन्होंने बीजक ग्रन्थ कैसे लिखा होगा? इसमें बहुत सन्देह है। न बुद्ध ने अपने समय में कोई त्रिपिटक लिखा और ना ही कबीर ने अपने समय में कोई बीजक लिखा। फिर भी कबीर और बुद्ध का साहित्य प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो उनके शिष्यों द्वारा स्मृति के आधार पर बाद में लिखा गया है।
 
कबीरपन्थी 'महात्मा पूरन साहेब' ने कबीर साहब के मुख्य ग्रन्थ मूल बीजक की जो टीका लिखी है, उसके अनुसार 'बीजक' के ग्यारह अंगों का वर्णन किया है- रमैनी - 84, शब्द - 115, ज्ञान चौंतीसा -34, विप्रमतीसी - 1, कहरा - 12, वसन्त - 12, चाचर - 2, बेलि - 2, बिरहुली - 1, हिंडोला - 3 और साखी - 353। इस तरह बीजक में छन्दों की कुल संख्या 619 है।
 
'बीजक' शब्द तांत्रिक उपासना से सम्बद्ध ज्ञात होता है। बौद्ध तंत्र में जिन सूत्रों से रहस्यमय तत्त्व की उपलब्धि होती है, उन्हें 'बीज सूत्र' या 'बीजाक्षर' का नाम दिया गया। इसी 'बीजाक्षर' में मन्त्रों की सृष्टि मानी गयी। इस प्रकार बीजाक्षर से शब्द तत्त्व का भी बोध हुआ। बौद्ध धर्म की वज्रयानी परम्परा से कालान्तर में सन्त सम्प्रदाय के स्रोत मिलते हैं। इस सन्त सम्प्रदाय में शब्द का बहुत महत्त्व है। सन्त सम्प्रदाय के काव्य में 'शब्द' और 'साखी' का विशिष्ट अर्थ और महत्त्व समझा जाता है। बीजक ही ऐसा ग्रन्थ है, जिसमें कबीर का क्रान्तिकारी स्वरूप पूर्ण रूप से उभरा है। कबीर के अनुयायियों ने कबीर पंथ की स्थापना की जिसका विवरण निम्न प्रकार है। 
 
कबीर का सतनाम पंथ  
 
कबीरपंथ कबीर के नाम पर स्थापित मध्यकालीन भारतीय संप्रदाय है। कबीर ने ही इसका प्रवर्तन किया था, यह विवादस्पद है। कबीरपंथी साहित्य से ज्ञात होता है कि संत कबीर ने चतुर्दिक अपने विचारों का प्रचार करने के लिए अपने चार प्रमुख शिष्यों- 'चत्रभुज', 'बंके जी', 'सहते जी' और 'धर्मदास' को भेजा था। प्रथम तीन शिष्यों के संबंध में कोई विवरण प्राप्त नहीं है। धर्मदास के विषय में अवश्य यह सूचना मिलती है कि उन्होंने कबीर पंथ की 'धर्मदासी' अथवा 'छत्तीसगढ़ी' शाखा की स्थापना की थी। इस समय जो अन्य संस्थाएँ दिखाई पड़ती हैं, वे भी कबीर अथवा उनके किसी शिष्य अथवा किसी परवर्ती व्यक्ति के नाम से ही संबद्ध हैं।  
 
एक अन्य मत के अनुसार कबीरपंथ के नाम से चलने वाली संस्थाओं का विभाजन इस प्रकार हुआ है-
 
(क) स्वतंत्र रूप से स्थापित कबीरपंथ की शाखाएँ, जिनका संबंध ऐसे व्यक्तियों से जोड़ा जाता है, जो कबीर के प्रमुख शिष्यों में से थे- इनमें रामकबीर पंथ, फतुहा मठ, बिद्दूपुर मठ, भगताही शाखा, कबीरचारा (काशी), छत्तीसगढ़ी या धर्मदासी शाखा शामिल हैं।
 
(ख) छत्तीसगढ़ी शाखा से संबंध विच्छेद करके जो पृथक् मठ के रूप में शाखाएँ स्थापित हुई हैं उनके नाम - कबीरचौरा जगदीशपुरी, हरकेसर मठ, कबीर-निर्णय-मंदिर (बुरहानपुर) और लक्ष्मीपुर मठ हैं।
 
शेष प्रमुख शाखाओं में से जिन्हें उपर्युक्त मध्यकालीन जाति-उपजाति-विकास के अनुसार ही कबीर के नाम से प्रचलित 'पनिका' कबीरपंथियों तथा कबीरवशिंयों का ऐसे समूह के रूप में विकास हो गया है, जिसे हम जुग्गी जैसी विशिष्ट जाति कह सकते हैं।
 
सत्य के मार्ग से डिगे नहीं कबीर

कबीर साहब को जो लोकप्रियता प्राप्त हुई है उसका कारण यह है कि, उनकी वाणी में सच्चाई की अनुभूति और अभिव्यक्ति का खरापन है। उन्हें जो अच्छा लगा उसका खुलकर समर्थन किया, और जो बुरा लगा उसका निर्भीकता से सख्त विरोध किया। जिसके कारण आज भी कबीर साहब की पहचान है, उनका नाम आज के समय में सभी की जुबान पर है। आज भारत में कबीर साहब के मठ भी देखने को मिलते हैं, गुरुद्वारों से लेकर मठों तक में लोग उनकी वाणियों का पाठ करते हैं। कबीर पंथ में लोग जुड़कर अपने को निडर और निर्भीक महसूस करते हैं, परंतु सच्ची बात बोलना आज की सल्तनत के लिए स्वीकार नहीं है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनमें विद्यार्थी, पत्रकार और प्रोफेसरों को सच्ची बात बोलने पर जेल में डाला गया है।

कबीर की खरी-खरी बातें सबके काम की 

कबीर जी भक्ति काल के प्रमुख रहस्यवादी कवि रहे हैं। कबीर अनपढ़ कवि रहे हैं, लोग उनकी साखियां जब वे गुनगुनाते थे तब लिख लेते थे। उन्होंने कहा है कि “मसि कागज गहयो नहीं, कलम छुआ नहीं हाथ।

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।
 
इंसान की फितरत कुछ ऐसी है कि दूसरों के अंदर की बुराइयों को देखकर उनके दोषों पर हँसता है, व्यंग करता है लेकिन अपने दोषों पर कभी नजर नहीं जाती जिसका ना कोई आदि है न अंत।

आधुनिक जगत में यह प्रासंगिक है, राजनैतिक जगत में यह सटीक बैठता है। जब कोई नेता विरोधी दल की बुराइयां करता है तो सामनेवाला आरोप का उत्तर न देकर आरोप लगाने वले को ही कटघरे मे खड़ा करने की कोशिश करता है। स्वस्थ आलोचना को कोई स्वीकार नहीं करता, जबकि स्वस्थ आलोचना का बहुत ही लाभ होता है।
 
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। 
पानी-साबुन के बिना, निर्मल करे सुभाय।
 
अर्थात: जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।
 
कुछ लोग अमर्यादित आरोप, प्रत्यारोप लगाते रहते हैं, अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हैं, अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हैं, किन्तु कबीर कहते हैं, कि वाणी में कटुता नहीं होनी चाहिए। मृदु वाणी में बोलने से व्यक्ति खुद शांत रहता है। सुनने वाला भी शांत हो जाता है, कबीर साहब कहते हे कि- 
 
“एसी वाणी बोलिए, मन का आपा होए, 
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय। 

व्यर्थ की बातों में बहस करके इंसान आज अपना समय बर्बाद करते हैं। सभी लोगों को मुख्य बातों पर ही ध्यान देना चाहिए। यह बात कबीर साहब ने बहुत ही सुंदर शब्दों में समझाई है-

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
 
अर्थात इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।

आज लोग अपनी बोली की वजह से जेल तक चले जाते हैं, इस संबंध में कवि ने कहा है कि-
 
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
 
अर्थात: जो व्यक्ति अच्छी वाणी बोलता है वही जानता है कि वाणी अनमोल रत्न है। इसके लिए हृदय रूपी तराजू में शब्दों को तोलकर ही मुख से बाहर आने दें।
 
जाति के संबंध में कबीर साहब कहते हैं-
 
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजियो ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
 
अर्थात: सज्जन व्यक्ति की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। जैसे तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी म्यान का, वह तो सिर्फ उसे ढकने वाला खोल होता है।

कबीर साहब ने जाति प्रथा को नहीं स्वीकार करते थे, उन्होंने इस दोहे के माध्यम से बताया है, व्यक्ति की कीमत उसकी जाति से नहीं उसके गुणों से होती है। लोगों की कभी जाति नहीं पूछना चाहिए, उनके केवल गुण परखने चाहिए। आज जातिवाद का जहर समाज मे इतना फैल गया है किस जाति देखकर इंटरव्यू में और प्रेक्टिकल में नंबर दिए जाते हैं। इसका उदाहरण है- सिविल सर्विस में आरक्षित वर्ग के प्रतियोगी परीक्षार्थी के लिखित में अधिक अंक मिलने के बावजूद इंटरव्यू में उसे उसकी मेरिट से कम अंक देकर सलेक्शन से बाहर कर दिया जाता है या उसकी रेंक नीचे कर दी जाती है। इस तरह समाज में तथाकथित विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग समाज के निचले पायदान पर अकेले गए अभ्यर्थियों को अपने बराबर आने से रोकने का निरंतर प्रयास करता है। कबीर हमेशा मेहनतकश वर्ग के हिमायती रहे हैं। मेहनत के वल पर हर क्षेत्र में आगे बढ़ने वाले अभ्यर्थियों को वर्चस्व प्राप्त जातियों के दंभी लोगों ने जाति के नाम पर मेहनतकश लोगों को हमेशा हाशिए पर धकेला है। भारत का नया संविधान आने के बाद भी जाति का दंश आज भी मेहनतकश वर्ग को सता रहा है। आज अगर कवि साहब होते तो वह इसके खिलाफ आवाज उठाते तो उन्हें निश्चित रूप से जेल की हवा खानी पड़ती।
 
युग दृष्टा कबीर
 
कबीर युग दृष्टा कवि थे। उनका व्यक्तित्व, उनकी वाणी युगीन परिस्थितियों की देन  है। कबीर ने अपने वर्तमान को ही नहीं भोगा बल्कि भविष्य की चिरंतर समस्याओं को भी पहचाना। कबीर का समाज जात-पांत, छुआछूत, धार्मिक पाखंड, मिथ्याडंबरों, रुढ़ियों, अंधविश्वासों, हिन्दू-मुस्लिम वैमनष्य, शोषण-उत्पीड़न आदि से त्रस्त तथा पथभ्रष्ट था। समाज के इस पतन में धर्म, धर्मशास्त्रों तथा धर्म के ठेकेदारों की अहम भूमिका थी। कबीर ने समय की नस को पहचाना। समाज के मार्गदर्शन हेतु एक बड़े संघर्ष एवं परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की। तत्कालीन विकृतियों और विसंगतियों के खिलाफ लड़ने की अथक दृढ़ता एवं सत्य की साधना का अदम्य साहस उन्हें जीवनानुभवों से मिला। उन्होंने जिन सामाजिक, सांस्कृतिक विषमताओं के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया, वे आज भी यथावत हैं। कबीर साहब का वैचारिक आंदोलन आज भी जाति-विहीन समाज के निर्माण, मानवता की बहाली, प्रेम, आडंबरहीन भक्ति तथा नैतिकता के निर्माण के लिए नितांत प्रासंगिक है। 
 
 मौत से भी बेखौफ कबीर
 
कबीर को मृत्यु से कोई डर नहीं था। वे इस रहस्य को समझ चुके थे कि मृत्यु अनिवार्य है। इस ज्ञान ने उन्हें निर्भय बना दिया था। यही कारण था कि उन्होंने सदैव अधर्म, अन्याय और असंगतियों का विरोध किया। मुल्ला, मौलवियों, पंडितों और जोगियों से भी उलझ पड़ते थे। मृत्यु के भय से कभी सत्य का दामन नहीं छोड़ा।
 
जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनंद।
कब मरिहौं कब पाइहों, पूरन परमानंद॥
 
अर्थात: जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। अतः मनुष्य को चाहिए कि सत्य का साथ दे। मृत्यु करीब है यह जानकर सभी से प्रेम तथा सदभाव रखें। तेरा-मेरा की दौड़ में जीवन को नष्ट क्यों करें? मनुष्य जीवन की क्षणभंगुरता को भूलकर अपने सुखों को चिरस्थायी बनाने हेतु रात-दिन मारा-मारी करता फिर रहा है। अपने लब्ध सुखों के आनंद को भी व्यर्थ कर दिया है। कबीर की दृष्टि में संसार व्यर्थ नहीं है बल्कि मनुष्य ने अपनी अज्ञानता के कारण इसे दुखदायी बना दिया है। लोभ-लालच के कारण यहां छीना-झपटी और लूट-मार मची हुई है। फलस्वरूप ढोंग, छल-कपट, चमत्कार प्रदर्शन की होड़ लगी हुई है।
 
मेहनत की कमाई के हिमायती
 
जिस धन-संपत्ति को प्राप्त करने के लिए लोग अपना सब कुछ बर्बाद कर देते हैं, कबीर उस धन को जीवन में सर्वसुखदाई नहीं मानते। क्योंकि वह नैतिक-अनैतिक तरीके से कमाया हुआ होता है। धन के आधिक्य से भोग-विलास बढ़ता है और जीवन में पतनशील मूल्यों की वृद्धि होती है। भौतिक समृद्धि से कोई बड़ा या महान नहीं हो सकता। खजूर का पेड़ कितना भी ऊँचा क्यों न हो जाएँ, वह सामान्य लोगों को फल और छाया प्रदान नहीं कर सकता। अतः कबीर धन का मूल्य सामाजिक उपयोगिता से आंकते हैं। जरूरतमंदों के प्रति स्नेहपूर्वक उनकी जरूरतों को पूरा करने वाला व्यक्ति ही बड़ा होता है। 
 
परमार्थी कबीर
 
कबीर यह भी कहते हैं कि धन अधिक होने पर पारिवारिक आत्मीयता, शांति तथा स्नेह नष्ट हो जाती है। सज्जन वही होता है जो अपने दोनों हाथों से गरीबों पर धन खर्च करें, क्योंकि वे अपने लिये धन एकत्र नहीं करते- 
 
वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखे, नदी न संचय नीर,
परमार्थ के कारने, साधुन धरा सरीर।
 
कबीर आर्थिक स्वार्थ को त्यागकर संयमित होने की शिक्षा देते हैं। मनुष्य अपनी जरूरत के अनुसार ही धन संचय करें। तभी समाज में समता, नैतिकता एवं मानवता की बहाली हो सकेगी। आर्थिक स्वार्थ से नैतिकता का ह्रास होता है।   
 
प्रैक्टिकल ज्ञान के पक्षधर
 
पुस्तकीय ज्ञान के महत्व पर भी कबीर के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। आज शिक्षा के कई आयाम हैं। तकनीकी विकास के साथ समृद्ध शिक्षा प्रणाली का दंभ भर रहें हैं। बड़े से बड़े प्रमाणपत्र प्राप्त कर बुद्धिजीवियों की पंक्ति में खड़े हैं। सवाल यह है कि हम कैसी शिक्षा का दंभ भर रहे हैं? जो नैतिक एवं मानवीय शिक्षा से परे केवल मानव रूपी मशीन तैयार कर रहा है। स्वार्थ, संवेदनहीनता से लबरेज मनुष्य जीवन के सत्य से भटक रहा है। कबीर स्वयं पढ़े-लिखें नहीं थे। अनपढ़ और नीच जाति से होने के कारण काशी के पंडितों से उलाहना पाते रहें। कबीरकालीन समाज तथा आज भी लोगों में अंधविश्वास व्याप्त है कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति ही पंडित, विद्वान होता है। कबीर इस धारणा को तोड़ते हुए कहते हैं कि सच्चा पंडित पुस्तकीय ज्ञान से नहीं बनता, बल्कि प्रेम में डूबकर बनता है। वे पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा जीवन के अनुभव तथा सच्चे प्रेम को महत्व देते हैं – 
 
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोई,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होइ।
 
जन्म पर आधारित जाति श्रेष्ठता के विरोधी
 
मध्ययुग में कबीर और संतों की वाणी ने जो अलख जगाया वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तत्कालीन युग में था। उन्होंने अपने समय में प्रचलित सभी मत-मतांतरों के सार को ग्रहण किया। उन्हें अपने तर्क और अनुभव की कसौटी पर कसा और जो विश्वास या मान्यताएँ मानवता के मार्ग में बाधक थीं उनका विरोध किया। कबीर सच्चे भक्त होने के साथ-साथ एक निर्भीक और स्पष्ट वक्ता थे। सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों-आडंबरों, दुराचार, पाखंड आदि का जैसा तीव्र विरोध उनकी वाणी में देखा जाता है, वह अद्वितीय है। 
 
भारत में धनानंद की सत्ता का अंत संत कबीर के काल से 17 सौ वर्ष पहले विष्णुगुप्त (चाणक्य) नाम के एक ब्राह्मण ने, तक्षशिला के यूनानी शासक सेल्यूकस के सहयोग से करवाया। चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का  शासक बनाया गया। जिसके द्वारा चाणक्य ने ब्राह्मण धर्म का प्रचार कराया और आजीवक जैसे पंथ को किनारे करवा दिया। मौर्य वंश के तीसरे शासक सम्राट अशोक ने ब्राह्मण धर्म को किनारे कर के बौद्ध धर्म का चरम प्रचार किया। ईसा से 185 वर्ष पहले मौर्य वंश के अंतिम शासक व्रहद्रथ मौर्य की कायरतापूर्ण तरीके से उनके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग हत्या करके मौर्य वंश की गद्दी हथियाली। इसके बाद भारत में अस्थिरता पैदा होने लगी और विदेशी आक्रमण होने लगे सबसे पहले विदेशी आक्रमण सिकंदर का हुआ जो मगध के शासक धनानंद की ताकत से डर कर भाग गया। शुंग और गुप्त काल में एक के बाद एक लगातार विदेशियों के आक्रमण होते रहे जिनमें यूनानियों, सीथियनों, हूंणों, कुषाणों, मंगोलों, तुर्कों और मुगलों ने भारत पाक लंबे समय तक राज किया। 
 
मध्ययुगीन संत
 
मध्ययुग मुगलों के आक्रमणों, धर्मांतरण, देशी राजाओं की विलासिता, धार्मिक पाखण्डादि से उपजे असुरता, भय, कुंठा, सांप्रदायिकता, रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं कुरीतियों का युग था। हताश-निराश जनता मंत्र, योग, जात-पांत, छुआछूत, सामंतशाही, दमन-शोषण से त्रस्त थी। समाज नैतिक पतन के गहरे गर्त में गिर रहा था। ऐसे में संत कवियों ने समय की नस को पकड़ा। उन्होंने जो कहा अपने अनुभव से कहा। जो देखा, भोगा और सहा उसी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति कबीर की वाणी है। 
 
कबीर से लेकर अन्य सभी संत समाज के अति सामान्य समझे जाने वाले पेशे से संबंध रखते थे। ये मोची, बुनकर, दर्जी, धोबी, लोहार आदि थे। समाज अनेक जातियों-उपजातियों, विभिन्न वर्गों में विभाजित था। फलस्वरूप जातिप्रथा तथा भेदभाव ने समाज को खोखला कर दिया था। मानवता कराह रही थी। कबीर मानव मात्र के समानता के पक्षधर थे। उनके अनुसार ऊँचे कुल में जन्म लेने से या ब्राह्मण होने मात्र से कोई ऊँचा या श्रेष्ठ नहीं हो जाता। मनुष्य अपने आचरण एवं सुंदर कर्मों से ऊँचा बनता है। सोने के कलश में मदिरा भरा हो तो निंदनीय हो जाता हैं- 
 
ऊँचे कुल का जनमियाँ, जे करणी ऊँच न होइ।
सोबन कलस सुरै भरया, साधू निंदत सोइ॥
 
मूर्ति पूजा के विरोधी
 
पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार।
याते तो चाकी भली जो पीस खाए संसार ।। 
 
इस दोहे के माध्यम से कबीर दास जी ने मूर्तिपूजन का विरोध किया है। उन्होंने कहा है की अगर पत्थर(मूर्ति) के पूजने से भगवान् की प्राप्ति होती है, तो मै उस पत्थर जो जहां से निकला है उसे ही पूजा करता हूं। मुझे तो हरि का सानिध्य मिल जाएगा। जो हमें ज्ञात ही नहीं है उस वस्तु को पूजने से क्या लाभ। इससे अच्छा तो हम उस चक्की को पूजें जिसका पिसा हुआ आटा हम उपभोग करते हैं।
 
उपरोक्त संदर्भ में एक कहानी
 
एक बार एक महिला ने अपने पुत्र का विवाह किया, बहू आयी, सास ने बहू से कहा कि चलो तुम्हें मंदिर में पूजा करा लाऊँ, दोनों मंदिर गयीं। मंदिर पहुचते ही बहू ने दो शेर देखे, बहू डर गयी। तब सास ने बोला, डरो मत ये तो पत्थर के हैं, और अपना माथा पीटा कहा, क्या पागल बहू मिली है। फिर आगे बढ़ी तो गाय अपने बछड़े को दूध पिला रही थी। बहू बोली, माता जी पहले घर जाकर एक बाल्टी ले आऊं, दूध निकाल लूँ। सास फिर नाराज हुयी। सास बोली, ये पत्थर की गाय है। कहीं पत्थर की गाय भी दूध देती है, फिर आगे मंदिर में पहुची। तब सास बोली, अब चलो देवी की पूजा करो। बहु इधर-उधर देखने लगी बोली, कहां है देवी? मुझे तो कहीं नही दिख रही हैं। सास ने कहा, सामने ही देवी हैं। इनसे जो मागो वह मिलता है। तब बहू बोली, ये तो पत्थर की है, ये मुझे क्या देगी। मेरे लिये तो आप ही सचमुच की देवी हो, आप से जो प्यार सम्मान मिलेगा, वह पत्थर से नही मिल सकता। आप घर चलिये, मैं आपकी ही पूजा करुँगी, आपकी ही सेवा करुंगी, आप ही मेरी देवी हो।कहने का भाव यह है कि जो आप के पास है उसकी इज्जत करो, उसकी ही सेवा करो, वही सच्ची सेवा है, वही पूजा है।
 
मानवता के लिये उससे ज्यादा कुछ नही है, अगर आप घर में रहनेवालों की सेवा नही करेंगे और बाहर जाकर मंदिर में भगवान की पूजा करते हैं। वह पूजा कभी सफल नही हो सकती।
 
निष्कर्ष 
कह सकते हैं कि कबीरकालीन विकृतियों, असंगतियों, रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों से आज भी हमारा समाज मुक्त नहीं हो पाया है। जात-पांत, छुआछूत, सांप्रदायिकता, अशिक्षा, गरीबी जैसी विषमताएँ जड़ जमाये बैठी हैं। आर्थिक स्वार्थ, दंभ, नैतिक पतन ने व्यक्ति को संवेदनहीन और स्वार्थी बना दिया है। शोषण, उत्पीड़न, झूठ, फरेब आज और भयानक रूप में देखा जा सकता है। अतः कबीर के समता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। जिन मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु वे जीवनभर संघर्षरत रहें, उस संघर्ष की लौ को फिर से जीवित रखने की आवश्यकता आ पड़ी है। प्रेम, मानवता, सद्भाव, सौहार्द और नैतिकता की बहाली के लिए कबीर के विचारों का पुनः अनुसरण समय की मांग है। “वे हर जेल के खिलाफ ‘आजादी’ हैं, हर सत्ता के खिलाफ सृजनधर्मी विपक्ष हैं। कठमुल्लापन और पुरोहितवाद, कट्टरपंथ के खिलाफ अब कबीर जैसे विपक्ष की जरूरत है। क्या ऐसी मुखर आवाज आज संभव है?
 
जो सच्चाई के रास्ते पर चलने के लिए जेल से भी नहीं डरे वही कबीर है। आइए आज कबीर की जयंती पर उनकी क्रांतिकारी वाणी को आदरांजली अर्पित करते हैं।